कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

प्रेम प्रतीक्षा

कोहरे में सिमटी सी पँखुड़ी भ्रमर से कुछ कह रही
ये कौन सी शीतल बयार चहुँ ओर आज बह रही

तुम प्रतीक्षा करना प्रिय ,ऋतुराज एक दिन आयेगा
खिल जायेंगे सब पुष्प फिर मादक दिवस हो जाएगा

ठिठुरन को थोड़ा संभलने , पीली सरसों को खिलने दो
खुश्बू से दिशाएं भरने दो , मलय पवन को चलने दो

तितलियों के झुंड में हिलमिल, तुम भी मादक गुँज़ार करना
हर पँखुड़ी सहलाना और जी भर मधुप फिर प्यार करना

शेफिलिका भी झाँकता है ओट में पत्तियों की छुपकर
चिड़ियों ने भी तैयार कर डाले घरौंदे करीने से बुन बुनकर

शिशिर ने छेड़ा है राग, प्रतीक्षा में रवि की सब विहाग
कोलाहल भोर का अब नहीं ,देरी से पँछियों की है जाग

शिशिर का आनंद अलग, तिल, गज्जक, गुड़ और गर्म अलाव
गर्म लिहाफों घुसकर खिचड़ी, लड्डू और मक्खन पुलाव

हर बार प्रतीक्षा अगली ऋतु की मानव स्वभाव करता रहता
मौसम भी मानुष मन सा चँचल है बार-बार बदलता रहता

मेरी प्रेम प्रतीक्षा बस तुम तक जरा प्रेम मोंगरे झरने दो
प्रिय,,, तुम भी राह तब तक तकना मन में प्रीत अभी भरने दो!

©नमिता चौहान
सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

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