कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

नागवार

“एक बात कहूँ अगर आप बुरा न मानें !” बेसन का तीसरा लड्डू अपने मुँह में रखती डायबिटिक पेशेंट संजना ने श्वेता से कहा
“जी कहिये!”
“आपकी निक्की परसों रात साढ़े ग्यारह बजे सोसायटी के गेट में एंटर हुई,मैं बॉलकनी से देख रही थी,कोई लड़का भी छोड़ने आया था!”
श्वेता संजना की सारी चालाकी व मंतव्य समझ रही थी पर सामान्य बनी रही,मठरी की प्लेट आगे बढ़ाती हुई बोली “
देखिए संजना जी वो अपना असाइटमेंट तैयार कर रहे थे, काम चूंकि ग्रुप में चल रहा था तो निक्की सहित सभी बच्चों को आज कॉलेज के बाद अल्पेश के यहाँ रुकना पड़ा,वे मेरे यहाँ आने वाले थे पर झुनू के हाफ इयरली एग्जाम के कारण निक्की ने ही उन्हें मना कर दिया, सारे बच्चे अल्पेश के घर इकट्ठा हो गए.. अल्पेश ही उसे घर छोड़ने आया था।” “नहीं श्वेता जी आप बहुत भोली हैं बच्चे ग्रुप असाइंटमेंट के नाम पर रात- रात भर इधर-उधर भटकते फिरते हैं,और माँ -बाप को उल्लू बनाते हैं !” संजना श्वेता को यह अहसास कराना चाहती थी कि निक्की श्वेता से झूठ बोल रही है।
“मुझे सारी जानकारी है संजना जी वे अल्पेश के ही घर थे, आज असाइंटमेंट जमा कराना है इसलिए कल हर हाल निपटाना जरूरी था!
लेकिन जाते-जाते संजना एक बार फिर कह गई “बुरा मत मानना श्वेता जी पर मेरा मानना है लड़कियों का ख़ास ध्यान रखना चाहिए!”
दरवाजा बंद कर वहीं सोफ़ा पर निढाल पड़ी श्वेता सोचने लगी संजना का बेटा तो किसी नॉर्मल डे में भी रात बारह,एक बजे से पहले घर नहीं आता, जो पढ़ाई में भी बिल्कुल फिसड्डी है,लेकिन हमेशा अव्वल आने वाली निक्की का पढ़ाई के सिलसिले में एक रात साढ़े ग्यारह बजे तक घर आना भी संजना जी या समाज के लिए नागवार है।”

©आशा पांडेय ओझा
उदयपुर राजस्थान

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