कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

रिश्तों को आजमाया नहीं करते

खो के भरोसा अपनों का,रिश्तों को कभी आजमाया नहीं करते,
अपने घर के मसले साँझ गैरों को कभी सुनाया नहीं करते!

आधुनिकता की होड़ में, शर्म हया और संस्कारों को छोड़ के,
नग्नता को अपना,घर की मान मर्यादा को मिटाया नहीं करते!

मुमकिन न हो निभाना अगर, तो मुकर जाना पहले ही,
उतर के दिल में किसी के खंजर ज़फा के चलाया नहीं करते!

दुख दर्द के अपने किस्से हैं, ये आने सबके हिस्से हैं,
कुरेद कर ज़ख्म किसी के नमक उनपे लगाया नहीं करते!

जब अपना दामन दागिल हो,कमी किरदार में खुद के लाखों हों,
उठा के उंँगली दूसरों पर, कमियाँ उनकी गिनाया नहीं करते!

हर इक दर्द दिल का अपना है, खुद ही सब कुछ सहना है,
बाँटेगा कोई और, ऐसी उम्मीद किसी से लगाया नहीं करते!

मिले जो मौका नेकी का, हित करके उसे फिर भुला देना,
बनके मददगार किसी का,एहसान उसपे जताया नहीं करते!

©सुशील यादव “साँझ”
नारनौल (हरियाणा)

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