कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

इंतजार

न‌ए साल के स्वागत में सोसाइटी में माता का जगराता है,मन तो नहीं है पर फिर भी थोड़ी देर के लिए हो आती हूं,ऋचा ने मन ही मन में सोचा…

मन में यादो के ज्वार भाटे उठने लगे, याद आने लगा 2013 का आखिरी महीने दिसंबर का आखिरी दिन, नए वर्ष के उपलक्ष्य में सोसाइटी में तब भी माता का जगराता था। ऋचा का मन तब बहुत उदास था, पर अपनी सासू मां निर्मला जी के बहुत कहने पर ऋचा उस जगराते में उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गई। टूटे हुए मन को कुछ सांत्वना देने के लिए, थोड़ा मन बदल जाए, उसके लिए ऋचा जगराते में पहुंचती है, वरना उसका तो उसी साल 2013 जून में आई उत्तराखंड त्रासदी में सब कुछ लुट चुका था।

उसका पति समीर अपने माता-पिता की इकलौती संतान था, ऋचा को आज भी लगता कि समीर अभी आएंगे और कहेंगे कि क्यूं बोला था ना कि जरूर वापस आऊंगा।

क्योंकि समीर कहकर गया था कि मेरी जान फिक्र ना करो बस चार-पांच दिन की ही तो बात है, इंतजार करना, जल्दी लौट कर आऊंगा, कहकर समीर दो महीने के बेटे उदय को ऋचा की गोद में सौपकर और पांच वर्षीय बेटी अन्विता को प्यार करके, मां बाप के ढेरों आशीर्वाद लेकर निकल गया लेकिन नियति देखो कोई आशीर्वाद काम ना आया, उत्तराखंड में हुए भयानक मंजर ने सब कुछ तबाह कर डाला ,ना जाने कितनी ही जिंदगियां,ना जाने कितने ही घर इस आपदा की भेंट चढ़ गए।

इससे पहलू ऋचा की जिंदगी में सब कुछ तो ठीक चल रहा था, फिर ना जाने किसकी नजर लगी ऋचा की सुखी गृहस्थी को कि समीर फिर लौट कर नहीं आना था,न आया..

लेकिन ऋचा इंतजार करती रही, उसे आज भी विश्वास था कि उसका समीर लौट कर एक दिन जरूर आएगा, उसने सभी के बहुत कहने पर भी दूसरे विवाह को हांँ नहीं करी। उसने कहा कि वो अपने सास-ससुर को छोड़कर नहीं जाएगी, इन्होंने भी अपना इकलौता बेटा खोया है, पर मुझे विश्वास है कि समीर एक दिन लौट कर जरूर आएंगे, वो जिंदगी भर अपने समीर का इंतजार यही इसी घर में करेंगी।

उसके विश्वास को उस 2013 के आखिरी महीने दिसम्बर के आखिरी दिन होने वाले जगराते में एक पंडित जी ने तब और मजबूत कर दिया,जब उन्होंने उसे सिंदूर देकर कहा विश्वास रख बेटी तेरा पति एक दिन जरूर लौटेगा।

तब का दिन और आज का दिन, दस वर्ष होने को आए, कितना कुछ बदल गया इन दस वर्षों में..
लेकिन नहीं बदला तो ऋचा के विश्वास का इंतजार…….

मौलिक व अप्रकाशित
ऋतु गुप्ता
खुर्जा बुलन्दशहर
उत्तर प्रदेश

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