दामन पे दाग़ लगने दिया ही नहीं
मंज़िलें कैसे मिलती मुझे जिसे ख़्वाबों में देखा,
सफ़र में किसी ने मुझे निकलने दिया ही नहीं !
उजड़ गया हैं आज़ इस चमन का ये बागबाँ मेरा,
तुफानों ने फूलों को कभी खिलने दिया ही नहीं !
उल्फतें उलझनों के बिच बित रहीं जिंदगानी मेरी,
इस जग ने मुझे कभी चैन से रहने दिया ही नहीं !
ए-ख़ुदा तेरी इस खुदाई पर आज हंँस रहा हूंँ मैं,
इस जग ने तो कभी मुझको हंँसने दिया ही नहीं !
दिलों से नफ़रतों को मिटाना ही चाहता हूं हर दम,
ज़माने ने मुझे किसी से प्यार करने दिया ही नहीं !
दुश्मनों को भी गले लगाने की फ़ितरत रखता हूं,
दोस्तों ने शिकवे-गिले रंजिशें मिटाने दिया ही नहीं !
हद से ज़्यादा किया है यहां यकीं सबके उपर मैंने,
मुझ पर यकीं कभी यहां किसी ने किया ही नहीं !
मझधार में जाकर लड़ रहा हूं तूफ़ानों से हर दम,
मेरी कश्ती को अभी तक मैंने डूबने दिया ही नहीं !
जंग ज़ारी रखीं है ज़िंदगी से हर मुकाम पर अब तो,
कभी भी मैंने अपना हौंसला टूटने दिया ही नहीं !
कोई कैसे इल्ज़ामात लगा सकता है यहां हितेंद्र पर,
मैंने कभी ख़ुद के दामन पे दाग़ लगने दिया ही नहीं !!
©हितेंद्र ब्रह्मभट्ट
अहमदाबाद, गुजरात