कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

दामन पे दाग़ लगने दिया ही नहीं

मंज़िलें कैसे मिलती मुझे जिसे ख़्वाबों में देखा,
सफ़र में किसी ने मुझे निकलने दिया ही नहीं !

उजड़ गया हैं आज़ इस चमन का ये बागबाँ मेरा,
तुफानों ने फूलों को कभी खिलने दिया ही नहीं !

उल्फतें उलझनों के बिच बित रहीं जिंदगानी मेरी,
इस जग ने मुझे कभी चैन से रहने दिया ही नहीं !

ए-ख़ुदा तेरी इस खुदाई पर आज हंँस रहा हूंँ मैं,
इस जग ने तो कभी मुझको हंँसने दिया ही नहीं !

दिलों से नफ़रतों को मिटाना ही चाहता हूं हर दम,
ज़माने ने मुझे किसी से प्यार करने दिया ही नहीं !

दुश्मनों को भी गले लगाने की फ़ितरत रखता हूं,
दोस्तों ने शिकवे-गिले रंजिशें मिटाने दिया ही नहीं !

हद से ज़्यादा किया है यहां यकीं सबके उपर मैंने,
मुझ पर यकीं कभी यहां किसी ने किया ही नहीं !

मझधार में जाकर लड़ रहा हूं तूफ़ानों से हर दम,
मेरी कश्ती को अभी तक मैंने डूबने दिया ही नहीं !

जंग ज़ारी रखीं है ज़िंदगी से हर मुकाम पर अब तो,
कभी भी मैंने अपना हौंसला टूटने दिया ही नहीं !

कोई कैसे इल्ज़ामात लगा सकता है यहां हितेंद्र पर,
मैंने कभी ख़ुद के दामन पे दाग़ लगने दिया ही नहीं !!

©हितेंद्र ब्रह्मभट्ट
अहमदाबाद, गुजरात

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