कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

आया राज बसंत

आया राज वसंत मन कोपल खिलने लगे हैं
टेसुओं खिल उठे स्वागत दिल मिलने लगे हैं।
बागों में छा गई रौनक कलियां मुस्काने लगी
सरसों पीली अलसी नील नभ सयाने लगे हैं।

गुल हुआ गुलशन गुलज़ार दिल मिल खिले हैं,
धरती महकी मनभावन कि खुशबू उड़ चले हैं,
प्रेम शृंगार नववधू नव पल्लव अंकुर आ गए,
महुआ की गंध गेहूं के बाली आम बौरे हिले है।

उड़ रही गंध कोकिल कंठ ने मृदु संगीत छेड़ा
वसंत में रागिनी ले हवा में मार तीर तान छेड़ा
लता लज्जा भरी मिलन को प्रियतम आगमन
चना बांध मुरेठा कोमलांगी अलसी है मरोड़ा।

नदी ताल तालाब पनघट में उमड़े रति रूप सी
तरकश तीर छोड़ा अनंग जला दिल निर्धूम सी
पेड़,पुष्प,लता,कली खिलती मंजरी स्वर्ण भरी
मधुप मदमत्त है नव उमंग जोशीले रहे धूम सी।

के एल महोबिया 
अनूपपुर मध्यप्रदेश

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