कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

चलो चलें

तू उठ चले, तू बढ़ चले
गिर जाए गर तो फिर चले।
तू पास खुद के है अगर
फिर तुझपे किसका वश चले।।


खुद्दार हो, तू धार हो
सम्मान को लेकर चले।
हों जख्म गहरे कितने भी
बन कर के आंसू बह चलें।।

हो आस तेरे दिल में भी
तू भी हवा में उड़ चले।
हो हौसलों में जब कमी
विश्वास खुद पर बढ़ चले।।

उत्कर्ष में अविचल रहो
और मान भी स्थिर चले।
संभाव्य कुछ भी है नही
तेरी भुजा में बल चले।।

शिवम् मिश्रा
उत्तर प्रदेश
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