कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

सड़क पर लड़की

सड़क के कोने पर लड़की हो
या फिर,
सुबह की ताजगी में,
बगीचे की बेंच पर बैठी लड़की हो ,
आते जाते लोगों की,
नजरों का शिकार बन जाती है,
लड़की अकेली क्यों है?
क्या सोच रही है लड़की ,
सड़क पर खड़ी ,
बेंच पर बैठी,
किसी के इंतजार में है क्या?
सड़क को कोई मतलब नहीं है,
बेंच भी नही पूछती है,
कि लड़की तू अकेली क्यों है?
बेंच पर बैठी लड़की,
सुबह की ताजी हवाओं को,
सांसो में भरती है,
गुजरती है तितलियां फूलों के पास जाती हुई,
उसके करीब से,
अपने रंगों पर इतराती हुई,
सड़क पर खड़ी लड़की बचती है
गाड़ियों के निकलते हुए धुँए से,
कहीं मेला ना हो जाए चेहरा,
इंतजार नहीं है उसे किसी का,
खुश है लड़की अकेलेपन में,
गुजरता जाता है समय,
उसको अकेले देख कर,
शहर देख रहा है अकेली लड़की को,
वो भर लेगी रंग,
अपने जीवन के कोरे कैनवास पर ,
अकेली रहेगी तो चलेगी,
संघर्ष के पथ पर,
बची रहेगी शिकारियों के बिछाए जाल से,
अकेली वो लड़की

इन्दु सिन्हा “इन्दु”
रतलाम (मध्यप्रदेश)

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