सुकून के आँसू
राधा बड़ी बेसब्री से अपने बेटे सुबोध का इंतजार कर
थी।
आज पूरे एक साल बाद अपने बेटे से मिलेगी राधा।
इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर बेंच पर बैठी राधा उस ट्रेन
का इंतजार कर रही थी, जिससे सुबोध आनेवाला था।
बैठी-बैठी वो अपने अतीत के पन्ने पलटने लगी।
अपने अम्मा-बाबूजी की लाडली राधा, 14 साल की कच्ची उम्र में 35 साल के भुवन से ब्याह दी गई थी।
छोटी सी राधा को यह समझ कहां थी, की वह
माँ-बाप रामनाथ और वृंदा के गरीबी की बलि चढ़ चुकी
थी। जमींदार साहब के खेत मे मजदूरी करने वाले रामनाथ ने सोचा कि पेट की भूख के आगे उम्र मायने नही रखती,कम से कम बेटी को दो वक्त की रोटी तो मिलेगी।
दुहेजु भुवन की पत्नी बनकर ससुराल आई थी राधा।
एक तो अपने से दुगने उम्र के शराबी पति के
अत्याचार को झेलती हुई आधा मर चुकी थी।
‘क्योकि भुवन काम-धंधा कुछ करता नही था, दिन
भर आवारा यार -दोस्तो के साथ शराब पीता था।
और आधी रात को किसी तवायफ के कोठे से नाच देखकर आता, और मासूम सी राधा को बुरी तरह
पिटता तथा रौब झाड़ता ।
अब राधा बेचारी शिकायत भी किससे करती ,माँ-बाप
को तो खुद भोजन के लाले पड़े थे।
राधा ने अपने गरीब माँ-बाप को कुछ भी बताना
उचित नही समझा और भुवन के अत्याचारों को
सहती रही।
भुवन की पहली पत्नी कमला के दो साल के
पुत्र सुबोध की पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी
राधा को ही उठाना पड़ता था।
अपने पति के दिए घावों पर खुद ही मरहम लगाती
और जमीन-जायदाद का खुद हिसाब रखती थी।
जो भी खेत का लगान वैगरह आता खुद ही लेती
थी, और पति से छुपाकर रखती क्योकि जानकारी
होनेपर भुवन सारे पैसे मार-पीटकर राधा से छीन लेता, तथा दारू-शराब मुर्गे में उड़ा देता था।
उस वक्त राधा को श्रवण की काफी याद आती थी जो
उसके पिता रामनाथ के दोस्त मांगीलाल का इकलौता
बेटा था और बचपन मे उसके साथ राधा खेला करती थी।
पांचवी जमात तक उसके साथ गाँव के सरकारी स्कूल
में पढ़ी थी राधा। वो पढ़ने में काफी तेज था तथा राधा
की मदद भी करता था।
जब रामनाथ और वृंदा खेतो में मजदूरी करने जाते, नन्ही राधा के घर के कामो भी श्रवण मदद करता था।
दोनों का प्यार देखकर मांगीलाल हमेशा कहता था,”
“रामनाथ तेरी बिटिया को मैं अपनी बहू बनाऊंगा”
जाने कब संग-संग खेलते दोनों में प्रेम का बीज अंकुरित
हो गया।राधा और श्रवण में प्रेम हो गया जिसे कोई
जान भी ना पाया जबकि राधा अचानक ही भुवन से
ब्याह दी गई थी।
जब राधा की बिदाई हो रही थी,श्रवण दूर खड़ा राधा
को डोली में बैठते देख रहा था।
श्रवण के सपने टूट चुके थे,,,,।
और उसकी आँखों से आंसुओ की धारा अविरल बह
रही थी, पर उसके मनोभावों को कोई समझ नही पाया।
राधा सोच रही थी,,,,जाने अब श्रवण कैसा होगा कहां होगा?
फिर भी पति के सारे अत्याचारों को झेलते हुए भी
राधा ने अपनी विधवा बीमार सास की भरपूर
सेवा की, क्योकि सात फेरों के साथ पतिपक्ष की
हर जिम्मेदारियों का वचन जो लिया था।
लेकिन उसकी सास कलावती देवी जो कैंसर के
अंतिम स्टेज में थी चल बसी।
भुवन भी एक दिन शराब के नशे में सामने से आती
हुई कार से टकरा गया, और उसके प्राण पखेरू उड़ चुके
थे।
अब बेसहारा राधा अपनी जमीन-जायदाद बेचकर
आपने मायके जौनपुर चली आई ।
अपने गाँव जौनपुर आने पर पता चला कि श्रावण भी
अपने माता-पिता के साथ किसी धनी आदमी के साथ
लखनऊ चला गया।
क्योंकि उसके माता-पिता को काम की तलाश थी,
गांव में ना नियमित काम मिल रहा था ना ही उचित मजदूरी मिलती थी।
फिर भी श्रवण को एक झलक देखने के लिए राधा बेचैन
हो उठी, पर वो कर भी क्या सकती थी।
जौनपुर आकर राधा अपने बेटे सुबोध को साथ लेकर
अपनी माँ वृंदा के साथ उनके मालिक जमींदार राजेश्वर
साहब के घर काम पर जाने लगी।
,,और,,,, एक दिन जमींदार साहब की बेटी नैना की नजर
राधा पर पड़ी।
“नैना कुछ दिनों के लिए पीहर आई थी।”
उसे राधा बहुत ही अच्छी लगी क्योकि राधा व्यवहार कुशल थी, और वो किसी का भी मन मोह लेती थी।
“उसने राधा की कहानी उसकी माँ की जबानी सुनी और
द्रवित हो गई।
फिर नैना ने राधा की मदद करने की ठान
ली, और साथ मे इलाहाबाद लेकर चली आई।
राधा ने भी नैना की बात मान ली, और किसी रोजगार
धंधे की तलाश में जमींदार साहब की बेटी नैना के
साथ उसकी ससुराल इलाहाबाद चली आई।
नैना ने भी राधा की बहुत मदद की, तथा अपने पति की
सहायता से एक छोटी सी रेडीमेट कपड़े की दुकान
खुलवा दी।
कुछ अपनी जायदाद बेचकर राधा ने रुपये -पैसे रखे थे।”कुछ नैना के पति राकेश बाबू जो एक बैंक मैनेजर थे, बैंक से लोन दिलवा दिया।
राधा की मेहनत से उसकी दुकान चल निकली, और
उसने अपने बाबूजी और अम्मा को भी वही बुलवा
लिया। सुबोध का दाखिला इलाहाबाद के एक अच्छे
स्कूल में करा दिया था,सुबोध भी काफी मेधावी निकला।
आज सुबोध एक आर्मी ऑफिसर है,अपनी ट्रेनिग पूरी
करने के बाद पहली बार घर आने वाला है।
राधा अपने बाबूजी और अम्मा के साथ एक घंटे पहले
ही रेलवे स्टेशन पर सुबोध के इंतजार में बैठी है।
अचानक उसकी तन्द्रा सुबोध की आवाज से टूटी।
माँ,,माँ कहाँ खोई हुई हो?,,,
कहते हुए सुबोध उसके गले से लिपट गया।
राधा की आखों में खुशी और सुकून के आंसू झिलमिलाने
लगे,वह सुबोध को गले से लगाकर खुशी से रो पड़ी।
लेखिका -शशिलता पाण्डेय
बलिया (उत्तर प्रदेश)