लोगों का काम हैं कहना
आरती रोज की तरह सबेंरे उठ कर नहा धोकर, नाश्तें की टेबल पर रखें अपनें मनपसंद व्यंजन पर जल्दी-जल्दी टूट पड़ती है, क्योंकि आज उसे रोहन से कुछ बात करने जाना था, वह आज रोज से ज्यादा बेहद खुश लग रही थी, मन ही मन वह प्रेम गीत गाने लगी:-
“आज उनसे पहली मुलाकात होगी फिर आमने सामने बात होगी “
बस इन्हीं ख्यालों में खोई हुई वह बस स्टॉप पर जाकर खड़ी हो जाती है फिर पहुंँचती है अपनी मंजिल अपने रोहन के पास।
आरती :-” रोहन क्या कर रहे हो तुम चलो कहीं चलते हैं घूमने तुमसे मुझे बहुत जरूरी बात करनी है मुझे नहीं पता इस बात करने को बात तुम्हारे मन में क्या विचार आते हैं पर मैं आज तुमसे कुछ जरूरी बातें करना चाहती हूँ।”
रोहन सोचतें हुए :-“क्या बात है आरती! ऐसी क्या बात करनी है तुम्हें मुझसे? सब ठीक है ना! तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं हुई ना! देखो अपना ख्याल रखा करो, मैं नहीं चाहता तुम्हें कोई दुख हो और तुम मेरी प्रिय दोस्त हो।”
आरती बहुत कशमकश में थी और उसने हिम्मत करके रोहन से बोली :-“देखो रोहन! मुझे नही पता कि एक विवाहित महिला का प्रेम करना सही है या नही और ना ही मुझे सही और गलत जानना है….! तुम्हे पता है जब भी कोई शादीशुदा महिला किसी के प्रेम में पड़ती है तो उसे ना तो पैसे की भूख होती है, ना ही हवस।
वो तो बस इतना चाहती है की कोई उसका दर्द बांँटने वाला हो। “
” कोई हो जो समझे उसकी भावनाओं को….
वो कभी टूटने न दे उसके विश्वास को…..
ध्यान रखे उसका, उसके उदास होने पर….
जो बिखरने न दे उसके जीनव को….
मदद करे उसके बिखरे हुए रिश्तों को समेटने में …..!
“वो देह से नही मन से प्रेम करे…..
इसलिए मैं तुमसे प्रेम कर बैठी! क्योंकि वो सब कुछ तुम करते हो…शुक्रिया तुम्हारा मेरी जिंदगी मे आने के लिए….तुम नहीं जानते की तुम मेरे लिए क्या हो….।”
“जिस तरह सूर्य को उसकी रोशनी,
फूलों को उसकी खुशबू, चंदा को चकोर, किसी सर्प को उसकी मणि से मोहब्बत होती है….. उतनी ही मोहब्बत मै भी तुमसे करती हूँ…..! “
“मैं तुम्हें अपने प्रेम पर यक़ीन दिलाना चाहती हूँ इसलिए नही कि तुम शक करते होगे बल्कि इसलिए कि तुम और भी प्यार करो मुझे और चाहती हूँ कि हर बार की तरह मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर तुम मुझे अपनें सीने से लगा लो और माथा चूम कर मुझे मना लो…..!!”
रोहन स्तब्ध खड़ा आरती की बातें सुन रहा था, फिर वो चुप्पी तोड़ते हुए कहता है कि :-“आरती ये सम्भव नहीं है! ये सच है कि मैं तुम्हें बहुत मानता हूँ दिल से और देह का मोहताज नहीं मेरा मन ये भी सच है! पर जमाना क्या कहेगा? कभी सोचना हमारे इस पवित्र रिश्तें को जमाना क्या नाम देगा? खास तुम्हें लोग क्या क्या नहीं कहेंगे? नहीं आरती हमें ये रिश्ता आगे नहीं रखना चाहिए!
आरती :-“देखो रोहन! लोग लोग क्या कहते है मैं परवाह नही करती क्योंकि मैं और तुम जानते हैं कि हम कितने पवित्र है फिर जमानें की हम क्यूँ सोंचे? बस मैं इतना जानती हूँ मुझे तुमसे प्रेम है और रहेगा! मैंने सारे जमाने को अलग करके तुम्हें चुना है, रोहन हमे दुनियाँ की दकियानूसी सोंच से क्या लेना-देना!
“लोगों का काम है कहना “
मैं बस! इतना जानती हूं कि तुमसे बात करके मुझे खुशीं मिलती है और वही मेरे लिए मायने रखता है…..।”
इतना सुनते ही रोहन नतमस्तक हो जाता है अपनी प्रेयसी आरती के सामने! सारे जमानें की परवाह किए बिना।
पूजा गुप्ता
मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)