कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

समीक्षा अंक – 01

हिंदी साहित्य का यह काल, नयी प्रतिभाओं के प्रस्फुटन का काल है। एक-से-एक, युवा एवं प्रौढ़ प्रतिभाएँ सामने आ रही हैं। अनेकों साहित्यिक मंच अस्तित्व में आ चुके हैं।

गद्य एवं पद्य, दोनों विधाओं में, सफलतापूर्वक दैनिक, साप्ताहिक, मासिक औनलाइन प्रतियोगिताएं, काव्य-पाठ आदि का आयोजन हो रहा है। पत्रिकाएं और साझा अंक निकल रहे हैं।

लगता है, हिंदी साहित्य के सचमुच अच्छे दिन आ गए हैं।

ऐसे में, कथालेख की भूमिका क्या होगी और अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य में आगे कितनी सफलता मिलेगी, यह भविष्य बताएगा। अभी तो, इसने शीघ्रता से और सफलतापूर्वक अपना पहला अंक निकाला है, जो सराहनीय है।

कथालेख, अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान बनाएगा, ऐसी आशा की जानी चाहिए। सर्वप्रथम इसे अपने आवरण, कलेवर, मुखपृष्ठ में नवीनता लानी होगी, जो औरों से (प्रतिलेख) भिन्न हो।

हिंदी में सेवा में, अंकों को भी, हिंदी में लिखा जाए, तो और भी अच्छा लगेगा।

प्रथम अंक में तीस रचनाएँ सम्मिलित की गई हैं, जो गद्य एवं पद्य, दोनों विधाओं एवं विविध रंगों में हैं, यथा — मां, मौसम, मौन, महंगाई, मोबाइल, मनोविज्ञान, धर्म, भक्ति, इश्क़, संबंध, त्यौहार, नव वर्ष आदि।

प्रत्येक रचना के साथ, रचनाकार का नाम, पता और चित्र दिया गया है। सम्पादकीय में भी, यही अपेक्षा थी। प्रत्येक के संक्षिप्त परिचय के रूप में, उनका नाम, पता, चित्र के साथ शिक्षा, व्यवसाय, उद्देश्य, अभिरुचियों, उपलब्धियों की चर्चा करना रोचक होगा।

सम्पादकीय में नये साल में, नये संकल्पों की आवश्यकता पर बल दिया गया है। मेरे विचार से नया साल हमारे जीवन में एक नई शुरुआत होती है, न कि होता है। नए संकल्पों को फोलो नहीं, फौलो करना चाहिए, बल्कि मैं तो कहूँगा अनुसरण करना चाहिए। विराम चिह्नों की अनदेखी खटकती है।

नये वर्ष के संकल्पों की चर्चा-क्रम में, एक नयी पत्रिका लाने के पीछे के कारण, उद्देश्य, संकल्पों पर भी प्रकाश डाला जाना अपेक्षित था।

सारी रचनाओं को पढ़ने के बाद, मैं, अपनी समझ एवं बुद्धि के अनुसार, उनकी विवेचना, थोड़े शब्दों में कर रहा हूँ। इसमें न कोई पूर्वाग्रह है, न कोई दावा। सहमति-असहमति का अधिकार सभी को है। सभी ने अच्छा प्रयास किया है। सभी क्रमशः और भी अच्छा करेंगे, ऐसी आशा करना स्वाभाविक है।

१.’दीवाना’ — डा. शीला गौरभि जी की लिखित, यह कहानी, प्रेम के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को चित्रित करने का एक प्रयास है। नायक द्वारा स्वयं को द्विमुखी व्यक्तित्व का बताया जाता है। अच्छा होता यदि इसे प्रसंगों, उदाहरणों द्वारा और स्पष्ट किया जाता। नायिका उसकी किस बात पर, कब, क्यों और कैसे प्रभावित हुई, इसका वर्णन अपेक्षित था।
नायिका की बिगड़ती हालत के लिए, उनकी गलत चिकित्सा को दोषमुक्त नहीं माना जा सकता।
विषय थोड़ा अलग है और कथा-लेखन का प्रयास अच्छा है।

२.’संबंध सुहाना’– प्रकृति में, हम सब, एक-दूसरे से प्रेम से जुड़े हैं। लीला तिवानी जी की एक सुंदर रचना। अंतिम पंक्ति में छलकन शब्द, थोड़ा नया लगता है। पूर्ण विरामों की उपेक्षा दिखती है।

३. तीसरी रचना का शीर्षक, अनुक्रमणिका में ‘शीत ऋतु’ दिया गया है। अंदर के पृष्ठ पर देवेन्द्र देशज जी की रचना, ‘दोहे’ शीर्षक से दी गई है। विषय वही है। अच्छी रचना है। क्वारे करें मलाल, लगे रजाई प्रेमिका जैसी पंक्तियाँ, पाठकों का मनोविनोद कर सकती हैं। बलिष्ठ बने शरीर, शीत के स्वास्थ्यवर्धक प्रभावों की ओर इंगित करता है।

४. चौथी रचना, ‘पैसा, माँ और मैं’, एक लघुकथा के रूप में है। गिरिराज पांडे लेखक हैं। किसी साधु-संन्यासी का, यों, कक्षा में आकर भीक्षाटन करते दिखलाना, थोड़ा असहज प्रतीत होता है। माँ की सीख और पैसों की उपयोगिता को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। विराम चिह्नों के यथास्थान उपयोग पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

५. पांचवी रचना, ‘मौन अखरता है’, आलोकेश्वर चबडाल लिखित एक बहुत सुंदर कविता है, जो अखरती नहीं,पढ़ने पर प्रसन्नता देती है। मेरी नदिया तू बस मुझमें मंथर मंथर बह ले, एक नया बिम्ब प्रस्तुत करता है।

६. ‘जाते हुए बरस से’, नमिता गुप्ता ‘मनसी’ द्वारा लिखी गई, संकलन की छठी रचना है। बातें, जो कभी कही नहीं गई, कविताएं, जो अधूरी रहीं… अच्छी पंक्तियाँ हैं, कहीं भोगे हुए यथार्थ को चित्रित करती दिखती हैं।

७. सातवीं रचना, ‘खोजता हूँ’, कविता के रूप में है। मदन मोहन शर्मा ‘सजल’ द्वारा रचित यह रचना वर्तमान में इंसानियत की खोज पर आधारित है। कुछ पंक्तियाँ ध्यान खींचती हैं — जाति बंधन से परे हो, मानता इंसान हूँ या फिर ‘मैं’ अहम भीषण गरल है, त्याग सबने ‘हम’ दिया।

८. आठवीं रचना, ‘मंहगाई की मार’, कविता के रूप में, मुदित अग्रवाल बिसौली जी द्वारा लिखित है। मंहगाई का रोना रोया गया है। हर वर्ग, विशेष कर, मध्यम वर्ग, इससे अधिक प्रभावित है। यदि महंगाई के कारणों एवं उसे कम करने के उपायों की भी संक्षिप्त चर्चा हो जाती, तो रचना, अधिक सार्थक प्रतीत होती। विराम चिह्नों का प्रयोग अपेक्षित था।

९. ‘मोबाइल और बच्चे’, इस अंक की नौवीं रचना है। कवि हैं डा.राम शरण सेठ। भाषा सरल, चिंता स्वाभाविक, एक हल्की-फुलकी कविता।

१०. सुधीर भगत जी की कविता, ‘गाँव जा रहा हूँ’, में उनका उत्साह और गाँव के प्रति प्रेम झलकता है। सरल, सुंदर, संकंलन की नौवीं प्रस्तुति। विराम चिह्नों पर ध्यान अपेक्षित है।

११. ग्यारहवीं रचना, ‘ये रिश्ते’, अजित कुमार कर्ण जी द्वारा लिखित, एक अच्छी कविता है, जिसमें, आज के समय में, सामाजिक रिश्तों की बदलती दशा पर चिंता व्यक्त की गई है।

१२. बारहवीं रचना, ‘आना तुम बनके बहार’, अपराजिता रंजना की कविता में, नवोदित प्रेम का उत्साह झलकता है। अच्छी रचना है।

१३. तेरहवीं रचना, ‘पूर्णिका’, सच्चिदानंद किरण द्वारा लिखित एक सकारात्मक भाव वाली कविता है, तथापि यत्र-तत्र लिंग, वर्तनी की अशुद्धियां एवं अर्धविरामों का अभाव ध्यानाकृष्ट करता है। यथा — मड़ोड़ (मरोड़), सबका (सबकी) सुनूं, चिता की (का)भय।

१४. चौदहवीं कविता, ‘निरुपम ग्राम पुलासर’, महावीर जोशी जी द्वारा रचित है, जिसमें, उनके द्वारा, अपने गाँव पुलासर का वर्णन किया गया है। वहाँ रहनेवाले, विभिन्न जाति-सम्प्रदाय वालों के बारे में, बताकर, अंत में ग्राम देवता की भी चर्चा की गई है। रचना अच्छी है। विराम चिह्नों का अभाव खटकता है।

१५. पंद्रहवीं रचना है, ‘विस्तार’। कवि हैं यू.एस.बरी, जो अपने नाम के आगे कवि लगाते हैं। सुंदर बिम्बों से युक्त, अच्छी कविता है। करती किलौलें हरती हर संताप के बाद करती मन को उच्छवास, कुछ जँची नहीं। आकृषित (आकृष्ट/ आकर्षित), वजती (बजती), पवन वह रहा (बह रहा), मोर नाचती (नाचते/नाचता) जैसी अशुद्धियों से बचा जा सकता था।

१६. सोलहवीं रचना, ‘स्मृति मेरे गाँव की’, सुभाष ‘धूलमाटी’ जी रचित, एक छोटी-सी, प्यारी सी कविता है। इसमें एक सुंदर चित्र खींचा गया है, जिसमें उनकी मां हैं, पास में बोलते कौवे हैं और उसके साथ गाँव की यादें हैं।

१७. ‘तुम और मैं’, इस अंक की सत्रहवीं प्रस्तुति, एक ग़ज़ल के रूप में है, शायर हैं अनमोल दिवाकर जी। अच्छी रचना है।

१८. ‘जिस नगरी की गलियों में’, भक्ति-भाव-युक्त, कृष्ण-प्रेम में रंगी, एक सुंदर रचना है। त्रिशिका श्रीवास्तव ‘धरा’ जी द्वारा लिखित, यह , इस अंक की अट्ठारहवीं प्रस्तुति है। हरी (हरि), निचे (नीचे) जैसी अशुद्धियों से बचा जा सकता था।

१९. नरेन्द्र पाठक बिसौली जी की कविता, ‘क्रोध’, उन्नीसवें क्रम पर है। पहली पंक्ति — क्रोध का पिता भय, बेटा बैर, माता उपेक्षा संग रहती है, विषय को अच्छी तरह से रेखांकित करती है। अनेक अवगुणों की चर्चा के साथ, इसे आत्मिक शक्ति भी बताया गया है।

२०. इस अंक की बीसवीं रचना है, अशोक दीप जी रचित कविता, शीर्षक है — ‘हाँ प्राण तुझे चलना होगा’। अच्छी कविता है। उत्साहवर्धन करते, कहीं नकारात्मक भाव भी आ गए हैं — हर मानव मुज़रिम रिश्तों का, हर आँगन है इक जेल यहाँ। पग में काँटों की उपमा में जहर बुझी शमशीर, विषधर के अतिरिक्त पार्थ धनुष के तीरों जैसे का प्रयोग किया जाना, थोड़ा चकित करता है।

२१. ‘नए वर्ष में एक आशा’, महेश शर्मा जी की कविता, इस अंक की, इक्कीसवीं रचना है। दर्द हर दिल का मिटाओ तो कोई बात बने, किसी रोते को हंसाओ तो कोई बात बने..अच्छे भाव हैं, अच्छी कविता है।

२२. ‘इश्क़’, मन्तशा जी की ग़ज़ल, इस अंक की बाइसवीं रचना है। सीधी-सादी, संक्षिप्त, अच्छी ग़ज़ल है। आशा की जानी चाहिए कि इनके शेरों में आहिस्ता-आहिस्ता गहराइयाँ बढ़ेंगी।

२३. ‘मत बांटो इंसान को’, गोविंद सरावत मीना ‘गोविमी’ जी की लिखी, संदेशात्मक, एक सुंदर कविता है, जो इस अंक की तेइसवीं रचना है। वस्तुतः वैचारिक संकीर्णता एवं धार्मिक असहिष्णुता, लोगों को बाँटने का काम करते हैं। उनसे बचने का संदेश दिया जाना चाहिए।

२४. ‘धर्म की धारणा’, इस अंक की चौबीसवीं प्रस्तुति है, जो एक लेख के रूप में है। धर्म एक व्यापक अर्थ एवं संभावना-युक्त शब्द है, विचार है, अवधारणा है। हम, प्रायः, पंथ को धर्म समझने की भूल कर बैठते हैं और आपस में उलझते रहते हैं।

२५. ‘गूरू क्या होते हैं’, अनुक्रमणिका में गुरु को गूरू लिखकर गुड़गोबर कर दिया गया है। अंदर गुरु ही रहने दिया गया है। अंक की पच्चीसवीं रचना, इन्द्र जीत सिहाग जी की यह कविता है, इसमें, उन्होंने, प्रमुख शिष्यों के माध्यम से, गुरुओं की महिमा का बखान किया है। इसी क्रम में, संभवतः, अपने गुरु का भी उल्लेख किया है। अच्छी कविता है। सचीन(सचिन) और इंद्रजीत (इंद्रजित) में वर्तनी की अशुद्धियाँ प्रतीत होती हैं।

२६. छब्बीसवीं रचना, ‘प्रियपथिक’, नमिता चौहान द्वारा लिखी गई है और कथालेख के, इस प्रथम अंक की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। भाव, भाषा, उपमा, बिम्ब सभी उत्कृष्ट हैं।

२७. ‘तुम और मैं संग संग’, इस अंक की सत्ताइसवीं रचना, एक कविता के रूप में है, जिसे, बहुत ही जोश-उल्लास के साथ, प्रवीण कुमार श्रीवास्तव जी ने लिखा है। पूस की रात की चर्चा में — नवोढ़ा को तो फर्क नहीं, मजबूत हो जाए और पकड़.. युवा-हृदय को रोमांचित कर सकता है।

२८. इस अंक की अट्ठाइसवीं रचना, एक सुंदर कविता के रूप में है, शीर्षक है –‘वनप्रिया ने गाया गाना’ और कवयित्री हैं शशिलता पाण्डेय जी। तत्सम, तद्भव शब्दों से सुसज्जित, सुप्रभात की शोभा का वर्णन, इस कविता का विषय है। इस अंक की श्रेष्ठ रचनाओं में से एक। कुछ सामान्य अशुद्धियाँ हैं, जिनसे बचा जा सकता था, यथा — नभ से उत्तर (उतर) धरा पर, किरणे (किरणें), आँखे (आँखें), कुहूकिनी (कुहुकिनी), कलध्वनी में गाना अथवा कलध्वनी का गाना ?

२९. सृष्टि देशमुख रचित ,’क्रिसमस के रंग’, इस अंक की, उन्नतीसवीं और एक संक्षिप्त एवं सरल रचना है। कविता की अंतिम पंक्तियों में, अँग्रेजी में wishes/wish के स्थान पर, आसानी से हिंदी विकल्पों का उपयोग किया जा सकता था।

३०. इस प्रथम अंक की तीसवीं और अंतिम रचना, एक कविता है, शीर्षक है — ‘कृष्णा-अर्जुन’ और इसे अनामिका संजय अग्रवाल जी ने लिखा है। महाभारत और गीता का संदर्भ है। फल की चिंता छोड़, कर्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। कृष्णा शब्द से भ्रम पैदा होता है। कवयित्री का तात्पर्य कृष्ण से है और कृष्णा, द्रौपदी को कहा गया है, जो उनकी सखा थी।

शुभकामनाएं !

©गोपाल सिन्हा,
पटना

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