कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023


समझौते

समझौते इस कदर किए हैं
मैंने जिंदगी में कि,
अब जिंदगी ही एक समझौता हो गई,

हर भूख, हर तमन्ना को कुचल दिया
जिम्मेदारियों के वजन ने,
हर बार ये अश्कों की इबारत हो गई,

एक इश्क हुआ था तुमसे, इस लीक से हट कर,
मुझसे तेरी बेखयाली,
जानलेवा शरारत हो गई,

अब तो बंद कर दी खिड़कियां
और दरवाजे सब हसरतों के,
ये जिस्म घुटती सिसकियों की इमारत हो गई,

मुझे देख लोगों के लबों पर, नुमाया होते है हंसी के नश्तर,
फरक पड़ता नहीं ज़ख्मों से अब,
कि, इन नश्तरों की ‘बेतौल’ आदत ही हो गई,

सांसों की जरूरत होती है जिंदगी के लिए,
अब तो हर सांस
समझौतों की विरासत हो गई।

©पी अतुल ‘बेतौल’

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