” हर रोज” कहानी
संध्या काल की मधुर स्मृति अब बुझने लगी. कितने दिनों से आता हूँ मैं इस वेला को अपने मे समेटने के लिए;लेकिन मैं क्षुदातुर ही रह जाता हूँ. मेरे हृदय की अतृप्तता ही मुझे यहाँ खींच लाती है. हर रोज की तरह र्सूय का गोला दीप्त होते -होते अंधकार से लड़ता न जाने कहाँ गुम हो जाता है .पता नहीं यह र्सूय की हार है या अंधकार की विजय .मैं हमेऊशा दिन और रात के बीच होती कसमा-कस को देखने आता हूँ. यह सावरकर ताल भी रात्रि का साथ देता है और र्सूय को अपने में समालेता है.
सुबह उठते ही सरकारी नल की लाइन मे जाना, घंटो बाद घर लौटना .सबेरे सबेरे चाय, नास्ता ,बच्च्चों की चिल-पौं के चिचयाते स्वर
उनको डांटती पत्नी की झिड़की और न जाने क्या-क्या देखने सुनने को मिलता है. कितना सधा हुआ लगता है यह क्रम विल्कुल उस खेल वाले की तरह जो अपना वैंलेंस वनाऐ रखता है, लेकिन उसके अन्दर कुछ घटता है, कुछ भय रहता है गिरने से संभलने का यर्थाथ से झूझता वो रस्सी पर चलने वाला दर्शकों की तालियां की गड़गडाहट से सब भूल जाता है और अपने आप को प्रसन्नचित्त पाता है. मैं भी चाहता हूँ. कुछ पल शांत और विचारों मे मगन होना पर कहाँ मिल पाता है वो सब …. अंधेरा होते ही चल देता हूं घर, वोझिल कदमों से .विचारों में इतना उलझ जाता हूं कि मैं अभी-अभी पत्थर से टकरा कर गिरते-गिरते बचा.
मंदिर मे आरती हो रही है. शंखनाद हो रहा है और झालर भी बजायी जा रही है.
शहर भी दिनभर की दौड़धूप से निजात पाकर ,कुछ सुकून पा रहा है .सडकें अलसायी सी इठला रहीं हैं .नालियों को फांदतें,आवारा कुत्तों से बचता-बचता मैं घर की ओर चला जा रहा हूं अग्रसर .कभी कभी हवा का झोंका मेरे नथूनों को छूं जाता है जिससे मेंहदी के फूलों की मनमोहक खुशबू मेरे अंतस को प्रफुल्लित कर जाती है .मैं कुछ और आगे नुक्कड़ से होता हुआ पतली गली से निकलता हुआ आगे बढ़ रहा हूं. मेरे नथूनों को मसालेदार खुशबु का अहसास होता है. मुझे लगता है कहीं खाना पकाया जा रहा है .कुछ लोग वांतों मे मग्न है और कुछ अपने घर का सामान सडक़ पर फेंक रहें है और अपनी पत्नीयों को मारने के लिए दौड़ पडते है. कुछ लोग उन्हें सभांल रहे हैं यहाँ गंदी वस्तीयों में ‘रोज’ अक्सर ऐसा ही होता है .दूसरे घर मे मैं देखता हूं पति पत्नी वैठै हुए हैं ;बच्चे पास मे ही सो रहे हैं .पत्नी सिर नीचे किये हुए जमीन को कुरींद रही है और पति उसे एकटक देख रहा है .उस स्त्री का मुख कितना लावण्ययुक्त दिख रहा है .जीवन की अनेक व्यादाओं से अछूते लोग समाज का एक हिस्सा बने हुए हैं. ऐसे समाज का जिसे कुछ पाने की हमेशा ललक रही है. मेरी छायाकृति बनती-बिगडती जा रही थी.मेरे साथ कभी लम्बी हो जाती ,कभी मुझसे भी बौनी हो जाया करती .कभी-कभी मेरी आकृति गंदे वहते पानी से होकर गुजरती, कभी पवित्र मंदिर, मस्जिद की दहलीज पर मत्था टेकती हुई आगे बढ़ रही थी.रात को अलग जन्तुओं की दुनिया होती है वो भी अपनी स्वर-रंजित ध्वनि निकाल रहे थे. हाथ में लगे खाली टिपिन का अब मुझे बोझ लगने लगा था. अंधेरे उजाले को चीरता फांदता मैं अपने घर जैसे स्थान पर आ गया हूं. यही मेरा निवास स्थान है. निःसंदेह पत्नी लेटी- लेटी वाट जोह रही होगी, मेरे पैरों की ध्वनि से रोज ही बिना वुलाये दरवाजा खोल देती है सिर पर साडी़ का पल्लू सरका कर थोडा़ हंस कर कहती है “आ गए” उसके इन दो शब्दों में पता नहीं क्या होता है कि मुझे भी अकारण हंसी आ ही जाती है, यही उसका स्वागत् है, यही रोज की नियति और झट से टिपिन मेरे हाथ से ले लेती है. मैं अबोध बालक की भांति उससे पानी भरा वर्तन लेकर हाथ पैर धोने लगता हूँ.
वो खाना परोसने के साथ साथ दिन भर की घटनाओं और बच्चों के क्रियाकलापों के बारे कह सुनाती जाती है… कभीकभी कनखियों से मुझे भी देख लेती है कि मैं उसकी वांतों को ध्यान से सुनरहा हूं या नही.मैं सब सुनता हूँ चुपचाप जैसे मुझे इन वांतों से कुछ लेना देना ही नहीं बस इसलिए ही सुन रहा हूं कि उसे अच्छा लगे .खाना-खाकर मैं लेट जाता हूँ फटे हुए बिस्तरों की सुन्दर सय्या पर ,पत्नी खाना खाकर वर्तनों को मलती है .मैं पड़ा-पडा़ सोचता हूं संसार के बारे में,देश के बारे में,अध्यात्म के बारे में, बच्चों के बारे मे,. पत्नी के बारे मे,समाज के बारे मे, मैं इतना खो जाता हूँ उन विचारों में अपने-आपको भी भूल जाता हूँ. मैं अपने-आप को पाता हूँ ;शुन्य से घिरा हुआ. लेकिन तभी पत्नी आकर मेरी सोच के तारतम्य को झकझोंरती है, वो आकर हाथ पैर-पौंछ कर फिर आइने के सामने जाकर खडी़ हो रहती है, निहारती रहती है अपने-आप को कुछ पल के लिये ,बिन्दी को ठीक करती है, थोड़ा चेहरे को निखारती है. अपनी मुस्कान से.फिर बच्चों के सिर पर हाथ फेरती है और चूमती है फिर आकर लैट जाती है वगल मे आकर.फिर कहती है-“सो गए क्या.” मै अलपक कुछ सोचने से उवरता हूं फिर कहता हूं -“ऊंह”कहानी-“हर रोज” का शेष भाग
मैंने कहा , “सो गये क्या”मैं हंसते हुए कहता हूँ, “अभी नहीं” वो और सट जाती है. मुझे उसके हृदय का स्पंदन की स्पष्ट ध्वनि महसूस होती है. उसका -उभरा हुआ वक्षःस्थल मेरे पीछे आकर टिक जाता है. मुझेधकुछ -कुछ गर्माहट-सी महसूस होने लगती है. मेरे हृदय की की ध्वनि को उसका हृदय और उसके हृदय की ध्वनि को मेरा हृदय स्पष्ट महसूस करते हैं. दोंनों हृदय की धड़कने मिलकर एक लय वनातीं हैं ;यही लय मेरे जीवन में नवस्र्पूति का संचार करतीं हैं.वह मेरा हाथ;अपने हाथ मे लेकर ,अपनी ठुड्ढी को मेरे पीछे गढा़ती हुई पूछती है, “कुछ उदास से हो” मैं उदासी का दामन छोडकर कर हंसता हुआ कहता हूँ,”नही,कुछ भी तो नही”और फिर वो भी मुस्कराने मे साथ देने लगती है.भारी मन कुछ हल्का हो जाता है.
अब मैं उसका हाथ अपने हाथ मे लेता हूं .तो वह और भी लावण्ययुक्त लगने लगती है. फिर पास के मंदिर से आते भजन -कीर्तनों से हमें घड़ी की याद आ जाती है. हम दोनों की नजर एक साथ घड़ी का दामन थाम लेंती हैं, जो ग्यारह बजा चुकी है ;फिर हमारी निगाह एक दूसरे से मिलती हैं. हम दोनों फिर एक बार हंसने लगतें हैं .फिर वह कहती है, “सुबह जल्दी उठना है” और शुभ रात्रि कह कर अपनी अपनी आँखे बंद कर लेतें हैं. सुबह उठते ही फिर शुरू हो जाता है ‘नया दिन, वो ही पुराना क्रम….
लेखक-यू.एस.बरी
,मैंहदी वाला सैयद ,लश्कर, ग्वालियर, (म.प्र.)
Udaykushwah037@gmail.com
9753804246
स्वरचित एवं मौलिक है।