कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

पेश ए खिदमत में :-
उन्वान: जन्नत
गज़ल
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मां के आंचल में जरा सा ठहर के देखें
जन्नत वहीं है जरा दिल में उतर के देखें हुस्ने- मतला -------- बे - हिसाब चश्म ए तल्ख़ाब पी कर के देखें जिन्दगी ज़हन्नुम हो जायेगी बे शज़र के देखे इश्तियाक़ नहीं मुझे किसी मह ए कामिल की ख़्वाहिश यहीं कि कोई मुझे नज़र भर के देखे नहीं बुझ सकीं बातिन किसीके सब्र ए दस्त के फूट के रो दूंगा जरा जिकर उनका कर के देखे कौन आश्कार करता है अपने दर्दे ए दिल का कैसे जीतोगे ये ईश्क़ ए बाजी बे- हूनर के देखे हिज़ाब कैसा ' मीर ' ये तेरे मेरे इस शानासाई में अल्लाह.. जरा फ़ैज़ ए ज़ल्वा ए ग़र के देखे ✍️ दिलीप वर्मा'मीर' आबूरोड़ जि-सिरोही राजस्थान दि: २१:०१:२०२३ मौ.न: 9587752079 ----------------- शब्दार्थ ------ इश्तियाक़ = उत्कृष्ट लालसा मह ए कामिल = चौहदवी का चांद ख़्वाहिश= इच्छा बातिन = भीतर की आग सब्र ए दस्त = दिलाशां आश्कार = प्रकट करना/ उजागर करना हिज़ाब = पर्दा फ़ैज़ ए जलवा ए ग़र = चमकता दिखाईदेना

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