कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

मौसम की लिखावट

कँपकँपाती हवा के आगे,
होगी नहीं कोई सुनवाई,
पूस-माघ में भली लगे,
नर्म धूप की अगुवाई।

आज फिर गांव की याद आई !

कैसे साँझ में अलाव को,
सब घेरकर करते थे तपाई,
किस्से-कहानियां निकल आते,
लोक-गीतों को गुनगुनाते,
उधर हल्की अँगीठी में
होती लिट्टी की सेंकाई,
सब भेद-भाव भुलाकर,
ठंड की होती थी भरपाई।

गांव में पुआल का गर्म बिस्तर,
छोड़ निकल पड़े बड़े शहर,
जाड़े से बचने को कंबल, रजाई।

अब कहां वो रिश्तों की गर्माहट,
अब तो स्वार्थ-द्वेष की मिलावट,
मौसम ने जो भेजी पाती,
हमने बदल दी उसकी लिखावट।

— गोपाल सिन्हा,
बंगलुरू,
८-१-२०२३

Design a site like this with WordPress.com
Get started