कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

गज़ल

हर साँस में तुम ही बसे तुम बे-सबब आदत मेरी
तुम से अलग कुछ भी नहीं तुम ही तो हो चाहत मेरी

मैं सो गया ये सोंच कर आओगी तुम फिर ख़्वाब में
बस फिर मेरी नींदें उड़ी यूँ रह गई हसरत मेरी

तुम कौन हो कैसी हो तुम इक रात पूछा चाँद ने
अब ग़र उसे आईना दूँ आएगी फिर शामत मेरी

चेहरा न देखो तुम मेरा सब नूर अल्फा़ज़ों में है
दिखने में थोड़ा हूँ बुरा पर है भली सीरत मेरी

ग़र जो अलग तुमसे हुआ कर ख़त्म ख़ुद को लूँगा मैं
अब ये भला कैसे करूँ होती नहीं हिम्मत मेरी

इक भीड़ राजाओं की थी था इक स्वयंवर ख़्वाब में
जब तुमने मुझको ही चुना तो बढ़ गई कीमत मेरी

जब से सुना दिल ने कि तुम महफ़िल में आते जाते हो
चल ‘जून’ चल महफ़िल में चल दिल कर रहा मिन्नत मेरी

©विश्वदीप 'जून'
उत्तर प्रदेश

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