कथालेख / अंक – 02 / फरवरी, 2023

शीर्षक – पाश

बन के पाश बांध लो मुझे
हां मैं चंचल हूं साध लो मुझे।

शोख हूं, रंग हूं , झनकार हूं
अल्हड़ , नाज़ुक अलंकार हूं
बन के डिबिया ढांप लो मुझे
हां मैं चंचल हूं साध लो मुझे ।

गीत हूं , ग़ज़ल हूं , संगीत हूं ,राग हूं
बनके आवाज सुर में ढाल लो मुझे
हां मैं चंचल हूं साध लो मुझे।

खुशबू हूं , झोंका हूं , एक आवेग हूं
बनके शीशी , डोर या बाहों में थाम लो मुझे
हां मैं चंचल हूं साध लो मुझे।

हकीकत हूं सपना हूं , एक खयाल हूं
देख लो, पहचान लो, जान लो मुझे
हां मैं चंचल हूं साध लो मुझे।

रुचि ‘अग्निरेखा’
हल्द्वानी, उत्तराखंड

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